तेरे नैनों की कातर निगाहों से
दिल पथभ्रष्ट हो गया
बनना चाहता था अफसर
लेकिन मैं तेरा मजनू बना
सादगी सी उमंग उमड़ उठी
दिल चंचलता में खो गया
कहते थे इस संसार में
कुछ बड़ा करके दिखायेंगे
बड़ा तो कुछ कर न सके
तेरी कातर निगाहों के सामने
हाँ बस यही अरमान उपजा
डूबा रहूँ तेरी कातर निगाहों में
क्या करूँ क्या न करूँ
ये प्रश्न निरंतर है उपजते
सुबह -शाम आठों प्रहर
तेरा शशि -मुख मण्डल है घूमता
तेरी निगाहों की चंचलता से
तेरे ख़यालों में हूँ डूबता।
प्रदीप कुमार गौतम
२४/११/२०१३
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