Thursday, 7 November 2013

गाँव

गाँव
वह मेरा छोटा -सा गाँव
कितनी रमणीयता को समेटे हुए
सदा मोहकता को लपेटे
स्वविरल चेतनता को भरे
मंद -मंद गति से
प्रमुद हो रहा था।
नीम के वृक्षों की
सरसराहट की आवाज़
छोटी -छोटी पत्तियां
उस पर उनकी कोपलता
थोड़ा कड़वाहट को समेटे
हर रोग को हरती थी
उस पर इमली का बड़ा -सा
विशाल -वृक्ष मंद -मंद हिल
स्वोपरि देवदूतों का झुण्ड
चीखते थे हर रोज़
पास में जाकर स्वमित्रों के साथ
देखते थे हर दिन उन्हें
गालियाँ सदा हमारी
मित्र हुआ करती थी
झुण्ड का झुण्ड दौड़ता था
सदा उस पर
कितनी सजीवता थी
उस समय
संगठित था पूरा समाज
एक -दूसरे के समीप बैठ
हाल  -चाल लिया करते थे
थोड़े कष्ट में भी
सभी सरीक हो जाते थे
हर पर्व में वह
सदा गुंजार करता था
बच्चों कि टोलियाँ
किलकारियाँ मरते हुए
सम्पूर्ण गाँव के भीतर
गलियों में घूमते थे
लेकिन आज मानो
मरघट में तब्दील हो गया है
कितना अजीब -सा लगता है
यहाँ आकर
सर्वत्र खंडहर
जिस पर स्वानों का झुण्ड
पिल्लों का सदन
बस
और कुछ नही बचा
अब सभी नगरीय में ढल रहे हैं
गाँव से विरल हो
शहरी बन रहे हैं।


                                                          प्रदीप कुमार गौतम
                                                            ०८/११/२०१३                                                                        

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