जैसे ही अरुण लालिमा को
अपनी गोद में भरकर
पहाड़ी की गोद में जाकर
स्वयं मग्न होता है
लेता है हिलोरे उमंगताओं से भरकर
फिर यकायक दिवस गगन से
तिमिर स्व स्वरुप निखरता है
नालियों से पचपचाती गन्दगी से
पंख खोल मधुर गुंजार कर
प्रकाश कि चाह में
भर उड़ान चल पड़ा
यत्र -तत्र देखकर
चमचमाती विधुत लाइट को
पाने कि चाहे में
फैल पंखों को
एक उड़ान भर
अचानक पहुँचा समीप
झपटा आगोश में
समेटने के लिए
पर ऊष्मा कि लौ
धधकी अति जोर से
थोड़ा ठिठक हटा कुछ दूर
ऊष्मा को पाकर
चेतन में व्याकुलता बङी
उसे पाने कि चाहे में
धन कि चाहे में मनुज
जैसे घूमता है दौड़ता है
अधिक से अधिक एकत्र करने के लिए
खो देता है अपना स्वरुप
वैसे ही वह दौड़ा
उसे समेटने के लिए
पर हाय !वह मिट गया
उस ऊष्मा की
धधकती लौ से
प्रदीप कुमार गौतम
१३/११/२०१३
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