Tuesday, 12 November 2013

मित्रता कि परत


तू आज मुरझायी कली -सी क्यों है
स्ववाकपटुता में चातुर्य को भरे
फिर भी अवयव से अकुलायी क्यों है
आत्म -चेतनता से है तू संचित
फिर यह नीरसता पायी क्यों है
माधुर्य भर देता है तेरे करों का छुअन
पर उनमें श्यामलता छायी क्यों है
तेरे वर्णों की अभिव्यंजना है अति मनोहर
फिर उन्होंने बेरूखू दिखायी क्यों है
तेरे वदन में मंद मुस्कान है मुखरित
फिर उसमें यह सिकुड़न तूने बढ़ायी क्यों है
तेरे अधरों की प्रफुल्लता है अति रमणीय
पर उसमें यह धूल सनायी क्यों है
तेरे कदमों की चाल है बढ़ी मंथर
फिर उनमें यह रूकावट आयी क्यों है
तेरे मस्तिष्क का विश्वास है अति दृढ़
फिर उसने यह व्याकुलता दिखायी क्यों है
तेरे धमनियों का रक्त हैअति तीव्र
फिर उसने यह शीतलता पिघलायी क्यों है
सर्वत्र जगत में तू है सम्पूर्ण
फिर मेरी मित्रता की परत हटायी क्यों है


                                                                                        प्रदीप कुमार गौतम
                                                                                          १२/११/२०१३

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