Wednesday, 13 November 2013

अमावस की रात


अँधेरी रात में बैठा अकेले
आकाश को निहारा था
तारों की रोशनी थी मद्दियम
उन्होंने किसी को पुकारा था
दुग्धावल स्वेद किरणों को भरकर
शीतलता को समेटकर
उसे दिया इशारा था
मानो बादल अर्द्धरात्रि में
अटखेलियां करते हुए
ताराओं कि शीतल किरणों का
स्पर्श करना चाहता था
लेकिन ताराओं को तो केवल
एक चाँद ही प्यारा था
वे सूर्यास्त होते ही
मिलन कि आस में
बैठ गये थे अपनी
चांदनी चद्दर फैलाकर
वे ह्रदय में आकुलता को भरे हुए
बिलबिला रहे थे मिलन के लिए
लेकिन उनकी आस अधूरी थी
और रहेगी भी आज सम्पूर्ण निशा
क्योंकि आज
अमावस की रात थी

                                                                                      प्रदीप कुमार गौतम
                                                                                        १३/११/२०१३

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