Tuesday, 26 November 2013

सुबह


हे ऊषा !
आज हृदय क्यों आकुल है ?
तू बता ना
ओस की बूँदो को भरकर
तू कहाँ लायी
इतनी मनोहर शीतलता
तूने कहाँ से पायी ?
इतनी श्यामलता को समेत
अमृत की बूंद को
तू कहाँ से लायी ?
हे प्रभा !
तूने ऊषा का हरण कर लिया
अमृत कि बूंद को तत्क्षण
ऊषा से विरल कर दिया
श्यामलता को ढक
जगत को प्रकाशित कर दिया
गगन मण्डल को लालिमा से
मण्डित कर दिया।
हे प्रभा !
यह शक्ति तूने कहाँ से पायी ?
मुझे बता ना।
हे प्रातः !
ये क्या तूने सोते मनुज में
शक्ति ,ओज ,शौर्य,से
संचित कर दिया
धैर्य कि परम्परा को
विकसित कर दिया
प्रभा का हरण कर
लालिमा को विरल कर
अरुण की किरणों से
जगत को भर दिया।
मनुज जग गया
चिड़ियाँ चहक उठी
देवालयों में शंक बज उठे
हे प्रातः !
ये पुञ्ज तूने कहाँ से पायी
मुझे बता न। .

                                                                             प्रदीप कुमार गौतम
                                                                               २६/११/२०१३


























































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































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