आग के ऊपर रख पात्र
नीर आहुति देता है
ऊष्मा कि चाह में
जैसे ही नीर ऊष्मा को
करता है प्राप्त
क्षीर समाहित हो जाता है
उसमे
मिल करते अटखेलियाँ
उचकते फड़फड़ाते दोनों
अपने अस्तित्व के लिए
उनकी समझ से परे
यह क्या हो रहा है हमारा
बस
वे यह ही चिंतन करते
चिंतन के आगोश में
खोय हुए इधर -उधर ताक रहे थे
तभी अचानक उनके ऊपर
कृष्ण वर्ण छोटे -छोटे डेन
समिश्रित हुए
अब तीनो मिल करने लगे कोलाहल
लेकिन कोई न सुन रहा था
उनका यह कारुणिक रुदन
तभी खांड आकर
उनका हल -चल पूछता है
सांत्वना दिलाता है
उसके एहसास से
उन्हें अपना स्वरूप साकार
समझ आता है
वैश्वानर से विरल
छोटे -छोटे छिद्रों से
पटतरौं कि गहराई से
साँस लेते हैं
साँस लेते ही उनके
तप भाप का स्वरुप लेता है
तब मनुज उस रसताप को
अधरों से मिलाकर
एक चुस्की लेता है
उस चुस्की से वह रस
गले के द्वार को लांघता हुआ
जीभ के ऊपर दौड़ता हुआ
संगीत से भरकर
उमंग से चलकर
गले में स्वताप
छोड़ता हुआ
आँतों को अपना एहसास
दिलाता हुआ
उदर में जाकर
आराम लेता है
उस रसताप के एहसास से
मनुज में जागती है
चेतना ,स्फूर्ति ,ताजग़ी
आलस्य से विरल कर
उसे पुनः शक्ति से
संचित करता है वह
आज उसका है महत्व अति
हरेक सदन में
होटलों में ,दफ्तरों में
अति धनवान से लेकर
निर्धन के घर भी
है उसका दबदबा
वह करता है नित्य
प्रातः गान।
आखिर है तो वह
आज के मनुज का
प्रिय पेय पदार्थ
वह तीव्र ताप को छोड़ता
लेकिन मनुज
एक चुस्की चाय की
जरुर लेता है।
प्रदीप कुमार गौतम
०७/११ /२०१३
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