ज्वालाप्रसाद अहिरवार बुन्देलखण्ड की धरती पर 1960 से 1980 के बीच सामाजिक क्रांति के क्षेत्र में बहुचर्चित नाम था । जिन्होंने लगातार जमीदारों से संघर्ष करते हुए समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करते हुए सामाजिक चेतना पैदा की, उस दौर में आपने उच्च शिक्षा ग्रहण करके शिक्षक के पद पर तैनात हुए तथा गले मांस को खाने, मरे जानवरों को उठाने के प्रतिरोध में अभियान चलाया जिसमें कई बार उच्च जातियों द्वारा गोलियाँ भी चलाई गई जिसकी वजह से उस समय आपने राइफल का लाइसेंस लेकर इन लोगों से मुकाबला किया । 1960 के दशक के जितने भी क्रांतिकारियों को देखता हूँ तो पाता हूँ कि वे केवल भाषणों द्वारा ही समाज को जागरूक नही कर रहे थे बल्कि लेखनी भी बहुत मजबूत थी । इसी कड़ी बुंदेली धरती में आल्हा लोक गायन बहुत अधिक प्रचलित था आल्हा को सुनने के लिए जमावड़ा लग जाता था इसलिए बाबू ज्वाला प्रसाद जी ने उस दौर में बाबा साहेब के पूरे जीवन संघर्ष को आल्हा तर्ज पर लिखकर लोगों के बीच गायन परंपरा के माध्यम से भी सामाजिक चेतना पैदा करने का काम किया और इसी क्रम में मुझे आज गोपाल महीप सर के माध्यम से इसकी प्रति प्राप्त हुई जो बहुत ही महत्वपूर्ण है पांच से छः पन्ने के इस लोक परंपरा भीम आल्हा में बहुत ही सारगर्भित बातों को लिखा गया है और उस दौर में ये पंक्तियाँ लोक परंपरा में बुंदेलखंड की धरती में गुनगुनाई जाती थी । आगे प्रयास जारी रहेगा जो साथी इस संदर्भ की कड़ी को आगे जोड़ते हुए समग्र जीवन संघर्ष के बारे जानते हो बताने का कष्ट करें क्योंकि पूरे बुन्देलखण्ड में बहुजन चेतना के रूप में यह बहुचर्चित नाम रहा है ।
ऐसे बहुजन नायक को क्रांतिकारी जय भीम
बाबू ज्वाला प्रसाद जी द्वारा लिखित 'आल्हा चेतावनी' की प्रारंभिक कुछ पंक्तियाँ रख रहा हूँ । आप सभी सुझाव जरूर दें-
भुमियाँ सिमरो महू छावनी, भुइयां माता तुम्हें मनाए ।
फूले बैठो मेरे कंठ में, भूले अक्षर देव बताए ।।
मालो पिता जी सीस नबाऊँ, भीमाभाई के चरण मनाए ।
जन्मे भीम कुंख इन्हीं की, कलयुग 'मनु' की पदवी पाय ।।
विधि मंत्री बन बैठे दिल्ली, बुद्धि का मिला न बारा पार ।
नेहरू, पटेल, गांधी काँपे, बाबा भीम ने दई ललकार ।।
हिन्दू धर्म मे जात पात की, भारी खाई परी दिखलाए ।
बाबा बोले नेहरू जी से, ऐसे राज्य पनप है नाय ।।
जाति पात का कोढ़ देश में, भारी बीमारी दिखलाए ।
दवा विचारों जल्दी इसकी, नहिं तो देश रसातल जाए ।।
चुप्पी साधी नेहरू गांधी, बाबा समझ गए मन माह ।
14 अक्टूबर सन 56 में, बौद्ध धर्म लीन अपनाए ।।
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