Thursday, 26 April 2018

आदिवासी रानी गैदीनल्यू का राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान

इस देश के इतिहासकारों ने हमेशा से आदिवासियों, दलितों ,पिछड़ों को ठगा है । भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सबसे अधिक शुक्रगुजार होना है, तो अंग्रेजों का होइए क्योंकि उन्होंने जाति, नस्ल, क्षेत्र को देखकर दस्तावेजीकरण नही किया, बल्कि कानून को कानून के हिसाब से लागू किया, जिसकी वजह से आज जब उन दस्तावेजों को खंगालते है, तो जिनके योगदान के लिए बड़े बड़े ग्रंथ लिख दिए गए । वे झूठे और थोथे समझ मे आते है, यदि बात हम स्त्री चेतना तथा स्वतंत्रता आंदोलन में भागेदारी की करें, तो पुरुषों से अधिक आदिवासी, दलित, पिछड़ें वर्ग की महिलाओं ने लड़ी है और केवल लड़ाई ही नही लड़ी बल्कि अंग्रेजों की यातना सहते हुए 05, 10, 15 वर्ष तक जेलों में व्यतीत किए हैं, लेकिन इस देश इतिहासकारों ने किस दोगली मानसिकता के तहत उनको अनदेखा किया है यह समझा जा सकता है इसके साथ वर्तमान समय में ऐसे शोधकर्ताओं की भारी आवश्यकता आ पड़ी है, जो ऐतिहासिक तथ्यों को एकजुट करके विभिन्न भाषाओं में अनुवादित करके अपने पुरुखों के किए वास्तविक संघर्ष को सबके समक्ष प्रस्तुत करे । इस देश को देश बनाने में सर्वाधिक योगदान आदिवासियों का है, जिन्होंने जल, जंगल, जमीन की महत्ता को समझकर निरंतर संघर्ष किया है तथा अंग्रेजों द्वारा जारी किए गए उपनिवेशवाद का उन्होंने जमकर सामना किया जिसकी वजह से अंग्रेजों के समय उनके जंगल काफी सुरक्षित बने रहे किंतु देश की स्वतंत्रता के पश्चात पूंजीवाद ने दुगनी गति से अपने पैर पसारने शुरू कर दिए और आदिवासियों द्वारा सुरक्षित जंगलों को भी उजाड़कर प्रदूषित कर दिया गया है और अब उसी प्रदूषण से देश को बचाने के लिए लाखों करोड़ों की योजनाएं लागू की जाती हैं और  विज्ञापन प्रचारित प्रसारित किए जाते हैं और करोड़ो रुपयों का बंदरबाट किया जाता है और जल जंगल जमीन की लड़ाई लड़ते हुए लाखों आदिवासी पुरुषों, महिलाओं को जेल में ठूस दिया गया । लेकिन उन्होंने कभी समझौता नही किया बल्कि राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए, वे सतत उपनिवेशवाद का विरोध करती रही, तो कई नायिकाओं ने सीधे अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेजों से मोर्चा लिया और उनकी वीरता का कई अंग्रेज अधिकारियों ने अपनी डायरियों में वर्णन किया है तथा उन पर दर्ज किए गए मुकदमों की फाइलों को सुरक्षित रखा गया, जिसकी वजह से आज हमें महत्वपूर्ण संदर्भ प्राप्त होते हैं । इस संदर्भ में अंग्रेज कमिश्नर ई.टी.डाल्टन ने लिखा है- "आदिवासी इलाकों में उन्हें 'जीतना' पड़ा ।' रक्तरंजित आदिवासी विद्रोह औरतों की साझेदारी के बिना न पूर्ण हुए और न वह ऐतिहासिक समृध्दि पा सके । समझौता विहीन और आरपार का संघर्ष कर तिलका मांझी उर्फ जारा पहड़िया से लेकर, तेलंगा खड़िया, बिरसा, जतना ने नींव डाली ।विद्रोहियों का ब्रिटिश  फौज के सामने न झुकने का एक बड़ा कारण था औरतों द्वारा मर्दों का पूरा साथ दिया जाना ।विद्रोह की कड़ी में 1855-56 का संताल हूल आदिवासी संघर्ष का ऐसा उदाहरण है जिसमें आत्मगौरव और आत्म सम्मान के लिए दस हजार से ज्यादा लोगों ने कुर्बानी दी । संताल औरतों का अपहरण और कुकर्म के बाद हत्या,  अंग्रेजों महाजनों, और जमीदारों के जुल्म से आदिवासी त्रस्त हो उठे, तो औरत मर्द सभी ने हथियार थाम लिए ।संताल हूल के नायक सिद्धों, चाँद, भैरव के साथ उनकी दो बहिनें फूलों और झानो ने अंग्रेजों के शिविर में जाकर 21 सिपाहियों की हत्या की । संताल लोकगीतों में आज भी इन बहादुर औरतों को याद करके यह समान आत्मगौरव से यह समाज भर उठता है  । खूब लड़ी मर्दानी माकी जैसी बलिदानी और फूलों झानो की कुर्बानी भला कैसे भुलाई जा सकती है ।"1
आदिवासी महिलाओं के संघर्ष को देखकर अंग्रेजों को यह आभास हो गया कि उपनिवेशवाद के विस्तार का सपना इनकी वजह से पूर्ण नही हो पायेगा, उन्होंने कभी भी अपनी संस्कृति को कमजोर नही होने दिया बल्कि जिसने भी उनकी सभ्यता संस्कृति पर आंख उठाई उलटे उसे मुँह की खानी पड़ी ।
  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नागालैंड की आदिवासी रानी गैदीनल्यू ने अंग्रेजों से कभी समझौता नही किया बल्कि उनका मुँह तोड़ जवाब दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि उन्होंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण समय युवा अवस्था को 15 साल जेल में रहकर गुजारा, जब यह देश आजाद हो गया तब कहीं जाकर उन्हें जेल से रिहा किया गया भारत सरकार से पदम  भूषण पुरस्कार प्राप्त होने के पश्चात भेदभाव कारी इतिहासकारों ने उनका कहीं जिक्र नही किया, लेकिन समय का पहिया है कि बाबा साहेब के भारतीय संविधान की बदौलत आज उनके विचारों को आदर्श मानने वाली पीढ़ी निरन्तर काल के गर्त में दफना दिए गए क्रांतिकारियों को खोजकर ही नही निकाल रही बल्कि उचित मान सम्मान दिलाने के निरंतर संघर्ष कर रही है । आज हम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाली नागालैंड की आदिवासी रानी गैदीनल्यू का विस्तार पूर्वक अध्ययन करेंगे ।
गैदीनल्यू का जन्म 26 जनवरी 1915 ई0 को मणिपुर के तामेड़ लोड़ जिला के लुआड़ काओ गांव में हुआ था । इनकी माता का नाम कलोटलेनिल्यू पामेई और पिता का नाम लोथोनांग पामेई था । आप बचपन से ही बहुत बहादुर थी बचपन से शिकार का आपको बहुत शौक था जिसकी वजह से कई जंगली जानवरों को आप तीर का शिकार बना लेती थी । रानी गैदीनल्यू 13 वर्ष की उम्र में ही समाज सेवा तथा नागालैंड की जनता के कल्याण के लिए रात दिन मेहनत करती थी अपनी उम्र की कई लड़कियों को तीरंदाजी एवं तलवार चलाने का प्रशिक्षण देना प्रतिदिन का काम था जिसकी वजह से पूरे क्षेत्र में काफी लोकप्रिय थी  । अपनी लोक सांस्कृतिक विरासत पर जीते जी उन्होंने आंच नही आने दी देश की रक्षा के लिए क्रांतिकारी जडोनांग के साथ मिलकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ मोर्चेबंदी की तैयारी कर दी जिसमें उन्होंने अपने द्वारा प्रशिक्षित किए गए युवकों एवं युवतियों की छावनी बनाना शुरू कर दिया, जिसका प्रभाव यह हुआ कि हजारों युवतियाँ उनके आंदोलन में शरीक होने के लिए छावनी में प्रवेश लेने लगी अलग-अलग गांवों में भी टुकड़ियां तैयार की जाने लगी सर्वप्रथम उन्होंने अन्तेगवा गाँव मे छावनी स्थापित की, लेकिन अंग्रेजों को इसकी भनक लग गई और अंग्रेज रानी गैदीनल्यू को पकड़ने के लिए भारी संख्या में फोर्स लेकर अन्तेगवा आती है जब तक रानी गैदीनल्यू के गुप्तचर उनको इसकी सूचना प्रदान कर देते हैं जिससे वे तत्काल अपनी छावनी वहां से स्थानांतरित करके हांग्रुम
ले आती हैं रानी गैदीनल्यू की गतिविधियों से अंग्रेजों में खौफ पैदा हो गया था क्योंकि पूरे क्षेत्र में उनकी छावनी का होहल्ला हो गया था तथा अंग्रेजों की रातों की नींद हराम हो गई थी जिसकी वजह से वे उन्हें गिरफ्तार करने के उद्देश्य से हांग्रुम पहुँचते है लेकिन रानी गैदीनल्यू के गुप्तचर बहुत तेज थे और वे अंग्रेजों की प्रत्येक गतिविधि पर नजरें रखते थे रानी गैदीनल्यू ने अपनी छावनी पुइबा गांव में स्थापित कर दी । अंग्रेजों के लिए रानी गले की फांस बनती जा रही थी जिसकी वजह से उनको पकड़ने की प्रक्रिया तेज कर गई और एक दिन ऐसा आ गया कि अंग्रेज सैनिकों एवं रानी द्वारा तैयार किए गए क्रांतिकारियों का आमना-सामना 16 फरवरी 1932 ई0 को हो गया भयंकर रक्तपात में बीसों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया गया जिसमें क्रांतिकारियों को भी भारी क्षति उठानी पड़ी लेकिन रानी गैदीनल्यू को पकड़ने में अंग्रेज सैनिक नाकाम रहे । इस संदर्भ में वासवी किड़ो लिखती हैं -"रानी गैदीनल्यू को गिरफ्तार करने की जब कोशिशें तेज हो गईं, तो सैनिकों के साथ 16 फरवरी 19312 ई0 को उनके नागा योद्धाओं की खूनी मुठभेड़ हुई । इस रक्तपात में रानी गैदीनल्यू के सात योद्धा शहीद हो गए । लेकिन नागा योद्धाओं ने अपनी जान की बाजी लगाकर रानी गैदीनल्यू को फिरंगियों के चंगुल में जाने से बचा लिया । इसके बाद उन्होंने अपनी छावनी का स्थल बदल दिया ।"2
वे अपने योद्धाओं को लगातार भालेबाजी, तीरंदाजी एवं बंदूक चलाने का प्रशिक्षण दे रही थी, लेकिन आदिवासी संस्कृति के अनुसार वीर योद्धाओं  राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होकर विदेशी हथियारों को चलाने से इनकार कर दिया, इसके बाद रानी गैदीनल्यू ने भी अपने वीर बांकुरों पर कोई दवाब नही बनाया और संघर्ष जारी रखा । इसी बीच पुइबा गाँव में किले का आधे से अधिक निर्माण हो गया था, तभी अंग्रेजी सेना के कैप्टन ने 17 अक्टूबर 1932 ई0 को प्रातः काल मे भारी संख्याबल के साथ पुइबा गाँव मे धावा बोल दिया । रानी गैदीनल्यू के वीर बाँकुरे हमले से बेखबर थे इसलिए अचानक हुए हमले के लिए वे पहले से तैयार नही थे । अंग्रेजी सेना ने किले को चारों ओर से घेर लिया था कहीं से भी निकलने का रास्ता नही था । रानी गैदीनल्यू अचानक आई मुसीबत से परेशान हो उठी क्योंकि उनके मन मे गहरा सदमा यह लगा कि उनके ही बीच के ही किसी व्यक्ति ने अंग्रेजों से मिलकर राष्ट्रीय भावना से गद्दारी की थी । इसके बाद भारी संघर्ष प्रारम्भ हुआ बंदूक की गोली और तीर कमान के खूनी संघर्ष में कई अंग्रेज हताहत हुए तो कई वीर बाँकुरे शहादत को प्राप्त हुए बंदूक की गोली और मजबूत घेराबंदी के सामने तीर कमान का जोर न चला । आख़िरकार रानी गैदीनल्यू को बंदी बनाकर कैप्टन मैकडोनाल्ड ने घसीटते हुए बाहर निकाला जिसकी वजह से रानी क्रोध की आग में धधक उठी और उन्होंने मैकडोनाल्ड के हाथ में इतनी भंयकर तरीके से काटा कि खून की धारा बह निकली और कैप्टन मैकडोनाल्ड की दो दिनों बाद मृत्यु हो गई । इसके बाद रानी को कोहिमा की जेल में ले जाया गया । इस संदर्भ में वासवी किड़ो कहती है -"सबसे पहले ब्रिटिश सैनिकों ने रानी गैदीनल्यू की पहचान की और उसे बंदी बनाकर । कैप्टन मैकडोनाल्ड ने रानी गैदीनल्यू के प्रति सख्ती बरतते हुए उसे खींचते हुए बाहर निकाला । ऐसा करने के लिए कैप्टन ने रानी गैदीनल्यू का हाथ पकड़ा तो इसका रानी गैदीनल्यू ने तीखा प्रतिकार किया और कैप्टन मैकडोनाल्ड के हाथ ऐसा हाथ गड़ाया कि उसमें गहरे ज़ख्म हो गए । इसी ज़ख्म की वजह से कैप्टन मैकडोनाल्ड की दो दिनों बाद ही मौत हो गई । रानी गैदीनल्यू को कोहिमा ले जाया गया । जब रानी गैदीनल्यू को ले जाया जा रहा था, तो योद्धाओं ने सैनिकों को काफी भला बुरा कहा था और गालियाँ दी थी । एक सिपाही को तो एक आदिवासी ने मार गिराया था ।"3
भारत देश के आजाद हो जाने के पश्चात भी रानी गैदीनल्यू को आजादी नही प्राप्त हुई इसके पीछे के कारणों को समझना होगा जब देश 1947 को आजाद हुआ तो उन्हें जेल से निकालकर मणिपुर के तामेंगलोंग जिला के के.वी. यिमरूपप नामक एक चम्ब नागा गांव के एक घर मे पांच वर्षों के लिए नजरबंद रखा गया था जो इस देश के शासकों पर प्रश्नचिन्ह लगाता है जहां स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को सम्मानित करने का दौर चल रहा था वहीं एक क्रांतिकारी स्त्री नायिका को नजरबंद रखा गया इसके पीछे का प्रमुख कारण जो जान पड़ता है वह यह कि रानी गैदीनल्यू पूरे क्षेत्र में बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व थी देश की आजादी के पश्चात निश्चित ही उन्हें शासन सत्ता में हिस्सेदारी देनी पड़ती केवल हिस्सेदारी ही नही बल्कि वे उस पूरे क्षेत्र की मजबूत नेता होती जिसकी वजह से क्रांतिकारियों में उनका नाम प्रमुखता से उजागर होता और घोषित क्रांतिकारियों नाम इतना अधिक जोरों से नही चल पाता इसी वजह से जानबूझकर उन्हें पांच साल के लिए नजरबंद किया गया और इन पांच सालों के दौरान सत्ता के मद में चूर लोगों ने क्रांतिकारी महिला की ओर से ध्यान फेर लिया । इस संदर्भ में मार्मिक शब्दो में वासवी किड़ो लिखती है -"ज़ुरा जेल से उन्हें तब मुक्त किया गया जब भारत को 1947 ई0 में आजादी मिली ।..लेकिन आजाद भारत मे भी उन्हें नजरबंद रखा गया । आजादी के तुरंत बाद जेल से निकलने के साथ ही पांच सालों के लिए उन्हें मणिपुर के तामेंगलोंग जिला के वी. यिमरूपप नामक एक चम्ब नागा गांव के एक घर मे नागरबन्द रखा गया था ।"4
04 अप्रैल 1952 ई0 को रानी गैदीनल्यू को अपने पुरुखों के गांव लुआड़ खाओ में भेज दिया गया इसके पश्चात उन्होंने अपने क्षेत्र में सांस्कृतिक धरोहरों को संजोने का काम शुरू किया और इन्हीं कामों में उनके दिन व्यतीत होने लगे वे लगातार पशुबलि का विरोध करती थी उन्हें बाद में सरकार की ओर से बिरसा मुंडा पुरस्कार, स्वामी विवेकानंद पुरस्कार तथा पदम भूषण पुरस्कार स्व नवाजा गया । इस तरह एक असली नायिका 17 फरवरी 1993 ई0 को हम सभी के बीच स्व चली गई । इस देश अनेकों ऐसी नायिकाओं ने जन्म लिया तथा जमीन पर संघर्ष किया लेकिन उनकी जाति और वर्ग उनके सामने आकर ऐसे अड़ गया कि कभी भी द्विज की कलम से इन नायिकाओं के लिए एक शब्द नही निकले ।

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