Thursday, 23 March 2017

बहुजन आंदोलन की धुरी सामाजिक आंदोलन

                   प्रदीप कुमार गौतम, शोधार्थी
                 बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी
                  मोबाइल-8115393117

पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम आने पर बहुजन समाज पार्टी के नेतृत्व  पर प्रश्न खड़े हो गए हैं, विभिन्न प्रकार की आलोचनाएं संपूर्ण देश में हो रही हैं तो विदेशों में रहने वाले बहुजन समाज के लोगों में भी निराशा घर कर गयी है । लेकिन यहाँ एक चीज समझना जरूरी है कि राजनैतिक सत्ता को प्राप्त करना तथा सामाजिक आंदोलन को अनवरत बरक़रार रखना अलग-अलग पहलू हैं । बहुजन आंदोलन आज से नही बल्कि हजारों वर्षों से निरंतर गतिशील है जिसे मनुवादी ताकतों ने समय-समय पर खंडित करने का प्रयास किया है और कभी तो जमीन में दफनाने का काम किया, लेकिन उसे कभी खत्म नही कर पाए ।
इस देश में दो विरोधी विचारधाराओं का आपसी टकराव प्राचीन काल से चला आ रहा है । बुद्ध जी के उदय से पूर्व बहुजन समाज को राक्षस, दैत्य, दानव,असुर, शुद्र इत्यादि नामों से पुकारा जाता था, लेकिन बुद्ध जी के उदय के पश्चात् श्रवण कहलाने लगे । गौतम बुद्ध के समय पर  मनुवादी ताकतें बेहद कमजोर पड़ गयी थी और वैज्ञानिक पद्धति का युग शुरू हो गया था । लेकिन बुद्ध जी के 400-500 वर्ष पश्चात् मनुवादी ताकतें आई और भारतीय संस्कृति को नष्ट किया लेकिन सम्राट अशोक जी ने बुद्ध धम्म का प्रचार किया और वह सम्पूर्ण काल ही बौध्द काल जाना जाता है । चूँकि बहुजन समाज की एक कमजोरी शुरू से रही है कि जैसे ही सत्ता पर काबिज हुए तो सामाजिक आंदोलन की गति को कमजोर कर दिया और मनुवादियों को अपने साथ मिला लिया और उन्ही मनुवादियों ने दीमक का काम करते हुए सामाजिक आंदोलन को खोखला कर दिया । सम्राट अशोक की तीसरी पीढ़ी शासक वृहद्रथ ने सामाजिक आंदोलन के काम में रूचि नही दिखाई बल्कि पुरखो के नाम की सत्ता का उपभोग वे लगातार करते रहे और जिन्होंने समझाने का प्रयास किया उसे सत्ता से बेदखल कर दिया, इसी आलस्य के भाव को समझकर उस समय पुष्पमित्र शुंग नामक मनुवादी सैनिक सत्ता के शीर्ष पद सेनापति बन जाता है और मौका पाते ही वृहद्रथ की हत्या कर देता है तथा बौद्ध भिखुओं के सिर कलम किए जाने लगते हैं और बहुजन आंदोलन की धुरी को कुचलकर मनुवादी शासन स्थापित हो जाता है । समय के साथ जुल्म-ज्यात्ती के नए-नए कानून स्थापित कर दिए जाते हैं । लेकिन बहुजन आंदोलन की गति तो धीमी पड़ती है, लेकिन बहुजनों के हृदय में  वह चिंगारी सदा जलती रहती है ।
मध्यकाल में आकर कबीरदास, रविदास, दादूदयाल, इत्यादि की वाणियों में स्पष्ट रूप से झलकता है और कबीरदास तो समाज सुधार का आंदोलन ही चलाते हैं । मुगलकाल गुजर जाता है लेकिन बहुजन आंदोलन निरन्तर गति पकडे रहता है । ब्रिटिश ईष्ट इंडिया कम्पनी पैर जमाती है जिसमें शिक्षा का समान अधिकार मिलता है जिसमें ज्योतिबराव फुले, पेरियार, नारायनगुरु, इत्यादि की चेतना जागृत होती है राजनैतिक चेतना से हीन होने पर भी बहुजन आंदोलन को पुनर्स्थापित करते हैं और मनुवादी ताकतों का खुला मुकाबला करते हैं ऐसे समय पर दो राजा छत्रपति शाहूजी महाराज एवं राजा गायकवाड़ भी बहुजन आंदोलन में मशाल देने का काम करते हैं और बुद्ध के शासन काल को पुनर्स्थापित करने के लिए बाबा साहेब का उद्भव होता है और वे जीवन पर्यंत बहुजन समाज के हक़ अधिकार के लिए संघर्ष करते है और सामाजिक आंदोलन को गति प्रदान करते हैं । संविधान के माध्यम से सभी के अधिकारों को सुरक्षित करते हैं ।
          इसके बाद धीरे धीरे बहुजन समाज में जागरूकता आने लगती है लेकिन सत्ता विहीन होने की वजह से आंदोलन की गति धीमी बनी रहती है और ऐसे समय पर बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम जी अपना घरवार, नौकरी छोड़कर बहुजनों को राजनैतिक चेतना से पूर्ण करने के लिए मनुवादियों के मुकाबले में खड़े होते हैं ऐसा नही है कि इनसे से आंदोलन नही हुए । आंदोलन हुए लेकिन उनका स्वरूप छोटा होने की वजह से वे चर्चा में नही आये, लेकिन मान्यवर साहेब ने देशव्यापी आंदोलन के माध्यम से सभी सामाजिक सङ्गठनो को अपने में समेट लिया और सामाजिक आंदोलन के माध्यम से अपनी राजनैतिक फसल तैयार कर दी और बहुजन आंदोलन में राष्ट्रीय नेतृत्व कर्ता के रूप में DS4, बामसेफ, बहुजन समाज पार्टी देश के सामने आई ।
   राजनैतिक सत्ता हासिल होने पर बहुजन समाज में थोड़ा ताजगी, सादगी आई और उसकी मेहनत से बसपा चार बार उत्तरप्रदेश की सत्ता पर काबिज हुई । मनुवादियों की निगाहों में यह भी खटकने लगा और सेंधमारी करते हुए देश के अंदर 7 अलग अलग बामसेफ तैयार हो गयी जिनका एक मात्र उद्देश्य बसपा को कमजोर करना रह गया । राजनैतिक सत्ता का रस चखने के बाद बहुजन समाज में कई  मुखौटाधारी कांशीराम के रूप में आये लेकिन न ही उन्होंने घर छोड़ा, न ही नौकरी छोड़ी और न ही सुंदरी । लेकिन बसपा पर हमले चालू हो गए ।
   हम सत्ता पर तो कम ही रहे हैं, लेकिन आंदोलन सतत चलते रहे हैं । इसलिए नेतृत्व जो कर रहा है उसको टोको कोई दिक्कत नही लेकिन सामाजिक आंदोलन को भी लगातार गति प्रदान करते रहो क्योंकि यह एक दो वर्षों का नही बल्कि हजारों वर्षों का संघर्ष है जो लगातार चलता रहेगा । इसलिए राजनैतिक हार से विचलित हुए बिना सामाजिक आंदोलन को गति प्रदान किए रहो और जीवन में उद्भव पराभव सदा होता है और कोई नेतृत्व सदा नही रहता है बल्कि आपको स्वयं आगे आकर नेतृत्व करना होता है ।
जय भीम नमो बुद्धाय
जय कांशीराम

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