Friday, 17 March 2017

बहुजन समाज पार्टी के पतन का एक कारण

                     प्रदीप कुमार,शोधार्थी
                    बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी

जिस कौम को मुफ़्त मे खाने की आदत पडी हो, वो कौम क्रांति नही कर सकती, जो क्रांति नही करेगे, वो कभी शासक नही बन सकते, और जो कौम शासक नही होती । उसकी बहन ,बेटी सुरक्षित नही होती. - मान्यवर कांशीराम
मान्यवर कांशीराम साहेब का यह कथन दूर दृष्टि का परिचायक है । मान्यवर कांशीराम जी राजनैतिक सत्ता के साथ जन आंदोलन में विश्वास रखते थे, कार्यकर्ताओं से मिलते थे और मनुवादी ताकतों का जमकर मुकाबला करते थे तथा समाज के दबे कुचले तबके को मेहनत के लिए प्रेरित करते थे , जबकि दलित, पिछड़े समाज के लोगो ने कभी भी मुफ्त की रोटी नही खाई उन्होंने सदा मेहनत को ही अपनी जिंदगी का हिस्सा माना है या यों कहें कि मेहनत के बल पर ही दो जून की रोटी उपलब्ध होती थी । मान्यवर साहेब के रहते हुए बसपा सरकार ने गाँव के पट्टों में मजलूम लोगों को कब्ज़ा दिलवाया 15/85 के नारे पर चलते हुए सवर्ण के अत्याचारों से बहुजन समाज को मुक्ति दिलाई । जितने भी सामाजिक संगठनों द्वारा सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ मान्यवर साहेब सभी कार्यक्रमों में सरीक हुए तथा सामाजिक संगठनों को खड़ा करने के लिए लोगों को प्रेरित किया । किन्तु उनके परिनिर्वाण के तत्पश्चात ही 2007 के विधानसभा आमचुनाव में बहुजन समाज पार्टी का नारा बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की जगह सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय कर दिया गया  । 15% समाज को 35 से 50% तक टिकट वितरण किये गए । निवर्तमान मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के पार्टी कार्यकर्ताओं के अत्यचार से जनता त्रस्त हो गयी तथा बसपा को 2007 में भारी बहुमत से जिताया । बसपा के सत्ता में आने के बाद बहुजन समाज के सामाजिक संगठनों को ही निशाना बनाया गया । सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रम बन्द कर दिए गए और पूर्व के शासन काल में जो जनता दरबार लगता था, 2007 में पूरी तरह बंद कर दिया गया और बसपा के बैनर तले  धरने प्रदर्शन बन्द हो गए ।
   मान्यवर साहेब बहुजन समाज को न बिकने वाला समाज बनाने की बात कह रहे थे । लेकिन बसपा का अ ब स न जानने वाला मोटी थैली देकर बसपा के विधायक, सांसद बनने लगे। जिसके चलते बसपा के कार्यकर्ताओं की अवहेलना होने लगी । तानाशाही का राज स्थापित हो गया । पुष्पमित्र शुंग  के इशारे पर वृहद्रथ रूपी बहिन जी अपने ही समाज से काटती चली गयी । यदि किसी भी सामाजिक संगठन ने सामाजिक जागरूकता का काम किया । तो बसपा के मठाधीशों द्वारा उन्हें बसपा विरोधी घोषित किया जाने लगा और बढ़ते संगठनों को जमीजोद करने पर उतारू हो गए ।
  जो मान्यवर साहेब सामाजिक संगठनों को सर्वाधिक महत्व देते थे , उन्ही के पैरोकार सामाजिक संगठनों को दफ़नाने को आतुर हो गए । तब मान्यवर साहेब की सामाजिक मूवमेंट का काम बसपा सुप्रीमों जी ने बन्द कर दिया और हाथी नही गणेश के नारे का हश्र 2012,2014,2017 में आपके समक्ष है ।

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