Monday, 16 December 2013

मन

हे मन !तू उदास क्यूँ है
तेरी चंचलता के किस्से
नित्य सुने हैं ढेर सारे
फिर आकुलता का कारण
क्या है
तू सृष्टि में एक मात्र
अथक रूप से करता है कार्य
प्रातः जागरण पर जाग मनुज संग
रहकर भी समीप नही होता तू
भ्रमण करता है तू
बहती शीतल समीर संग
हिम -खण्ड में लोटता पाया मैंने
या क्षीर का पान दृढवत अवयव को कर
क्रीड क्षेत्र में धावक बन दौड़ता
साथ रहकर भी घूमता है तू
मध्यान्ह में मनुज साथ रहकर भी
कहीं जूस का पान करता है
आखिर मन तो मन है
भ्रमण करना है उसका काम

प्रदीप कुमार गौतम
१६/१२/२०१३

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