Wednesday, 18 December 2013

तू जान है मेरी


तू इबादत के संग पहचान थी  मेरी
हँसती हुई जिंदगी की चिराग थी  मेरी
खिले हुए मुखड़े पर मुस्कान थी मेरी
हाँ माना कि तुझे डांटा है मैंने तुझे
सताया भी हद से ज्यादा तुझे
तेरी शर्त के मुताबिक ढाला था अपने आपको
जब -जब तू रूठी मनाया मैंने
तेरी जिद के आगे सिर नवाया मैंने
कुछ जग में करके दिखाऊँगी था कथन तेरा
तेरे कथन को आयाम देने में लगा था मैं
तेरे हौंसलों को उड़ान देने में लगा था मैं
नहीं पिघलाया स्वहृदय को मैंने तेरे सामने
शायद तेरे ह्रदय को शिल समान बनाने में लगा था मैं
तेरी खातिर उसूलों को भी तोड़ा था
गुरु -शिष्य कि परम्परा में प्रेम बीज बोया था
मेरे उसूलों को तूने पूरी तरह धोया था
फिर भी मैं चुप था ,खामोश था
क्योंकि
इस ह्रदय में सिर्फ तू ही समायी थी
तू खूब दूर हो जा मुझसे
लेकिन मेरे ह्रदय में तेरी परछाई थी
नही तोड़ूंगा मैं बंधन यह प्रेम का
क्योंकि सम्पूर्ण जग में सिर्फ
तू ही मेरी एक जान थी
जान है
जान  रहेगी

                                                                            प्रदीप कुमार गौतम
                                                                             १८/१२/२०१३  

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