Thursday, 19 December 2013

प्रेम


यदि प्रेम बस शादी है
तो मैं नही मानता
प्रेम में भाव है यदि लेन -देन का
तो मैं नही मानता
प्रेम है उजागर करने का नाम
तो मैं नही मानता
प्रेम आत्महत्या का है नाम
तो मैं नही मानता
यदि प्रेम शक से हैं बंधा
तो मैं नही मानता
यदि प्रेम है आडम्बर का नाम
तो मैं नही मानता
क्योंकि जो मैं जनता हूँ
उसी को मैं प्रेम मानता हूँ
समर्पण है जँहा सदा नित्य
सहयोगी बना खड़ा हो साथं
जग एक ओर पर प्रेम है संग
शहादत के लिए तैयार है जो हरपल
जहाँ सूरत देख प्रेमी की
ह्रदय पुलकित हो जाता है
भ्रमर गुंजार करने के पश्चात्
पुष्प रस चख जाता है
जहाँ सर्वत्र समर्पण है
हर प्रकार से
बस !प्रेमी उसी का नाम है
प्रेमी उसी का नाम है

                                                                  प्रदीप कुमार गौतम
                                                                     १९/१२/२०१३

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