Monday, 28 October 2013

गेंहू


वह पहले जमीन की
कोख़ पर छिपकर करता  है
अपने को अंकुरित
फिर वह अपनी यौवनता पर
लहलहाता है क्षेत्र पर
फिर मद्धिम गति पाकर
प्रौढ़ता को स्वीकार कर
बलिदान देता है वह अपना
सूखकर हमारे पोषण के लिए
क्षेत्र से आकर माँ के हाथों
धुला जाता है उसे
फिर सदन के आँगन में
फैलकर अंगड़ाई लेता है
फिर सूखकर हमारे पोषण
के लिए बलिदान देता है
चाक के दो पाटों के मध्य में
मिट जाता है अस्तित्व उसका
बदल देता है अपना रंग
तसले के मध्य पुनः आहुति देता है
फिर पीटा जाता है उसे दो करों से
फिर गोलाई में जाकर
बेलन से नया रूप धारण
करता है वह अपना
आग में जाकर स्वयं जलता है
फिर निवाला बनता है
हमारी बुभुक्षा मिटाने के लिए
उसका अस्तित्व है साकार
 वह है अविरल महान
तभी तो वह दुर्दांत दुःख
सहन करके
मिटाता है हमारी
कारुणिक बुभुक्षा को.. …………………।

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