मैं निरत देखूँ उसे
लेकिन वह छिपा है
तेरे श्यामल केशों में
उसे देखने के लिए हूँ
आतुर ………
फिर भी कपोलों में
बैठकर खेलता है वह
छुपाछुपी.................
मैं हूँ निरत प्रयास में
उसे देखने के लिए
लेकिन वह फिर भी
कभी छाया में ,बालों में
अधरों के ऊपर छुपा बैठा है
नासिका के नीचे आगोश में
वह छोटा सा तिल।
प्रदीप कुमार गौतम
३०/१०/२०१३
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