1986 से हंस पत्रिका का संपादन करने वाले डॉ राजेंद्र यादव जी के अचानक निधन की खबर आते ही साहित्यकारों में शोक की लहर दौड़ गयी .क्योंकि यादव जी ने अपने विचारों से साहित्य में दलित साहित्य एवं स्त्री विमर्श चिंतन की जो धारा प्रवाहित की वह साहित्य में एक नवीन चिंतन की शुरूवात थी जो आज का प्रमुख चिंतन है। हंस पत्रिका के माध्यम से इन्होने अनेक कालजयी कवियों ,चिंतकों एवं समीक्षकों को उत्पन्न किया। ऐसे साहित्यकार के गमन से एक युग का अंत हो गया। शोक अभिव्यक्त करते है।
प्रदीप कुमार गौतम
राजेंद्र नगर ,उरई ,जालौन
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