Sunday, 29 May 2022

संत रविदास के लोक प्रचलित क्रांतिकारी विचार

संत रविदास के लोक प्रचलित क्रांतिकारी विचार
प्रदीप कुमार, शोधार्थी
हिंदी विभाग, गाँधी महाविद्यालय, उरई
जालौन(उ0प्र0)
मोबाइल-8115393117
ईमेल-pradeepkumargautam72@gmail.com

    भारत देश में प्रारम्भ से ब्राह्मण एवं श्रमण  संस्कृति के मध्य निरंतर संघर्ष चलता रहा है ब्राह्मण हवन पूजा कर्मकांड पर आधारित पोंगापंथी समाज का निर्माण करना चाहते थे जिसमें वे स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित करवाते है और सामान्य जनता को ठगकर अपनी रोजी रोटी का जुगाड़ करते हैं , जबकि श्रमण संस्कृति को मनाने वाले लोग मेहनत के बल पर खून पसीने की कमाई से अपना जीवन यापन करते थे जिसमें वे तर्क पर आधारित लोक जीवन, लोक व्यवहार मानवतावादी समाज के निर्माण करते हैं जिसमें समता, बंधुत्व एकता, न्याय पर आधारित श्रेष्ठ समाज का निर्माण करते है । यही श्रमण परम्परा तथागत बुद्ध, चार्वाकों, सिद्धों ,नाथों से होते हुए मध्यकालीन भारत में 15वीं शताब्दी के मध्य शेषनागों(बचे हुए नागवंशी लोगों) ने अपने अधिकारों को माँगने का सिलसिला शुरू किया तो पूरे देश मे क्रांति की चिंगारी फैल गई जिसमें नागवंशी संतों कबीरदास, रैदास, दादूदयाल, आदि ने जातिगत, धर्मगत, लिंगगत भेदभावों के खिलाफ समाज को जाग्रत करना शुरू कर दिया था जिसका परिणाम यह हुआ कि वर्णवादी व्यवस्था चरमराने लगी थी बड़े-बड़े मंदिरों में लोगो ने जाना बंद कर दिया । संत रविदास का प्रभाव पूरे भारत देश मे था उनके चेले देश के कोने कोने में फैले हुए थे । सन्त रविदास की बहुत -सी वाणियाँ लोक पद्धति में आज भी विद्यमान है लेकिन लेखन परम्परा में उनका जिक्र नही मिलता है । मुझे लगता है इसके पीछे कुलीनतावादी लोगों से बहुजन समाज के लोग अलग न हो जाएं इसीलिए उनके ओजस्वी विचारों को दबा दिया गया तथा तोड़मरोड़ करके ऐसे  विचारों को सभी के सापेक्ष परोसा गया जिससे क्रांति न हो सके इसके बाद भी मध्यकाल में शेषनागों ने अपने सिर हिलाना शुरू कर दिए थे इसीलिए पूरे देश मे भूचाल आ गया था और बनी बनाई वर्णव्यवस्था  ध्वस्त होने लगी थी जिसका परिणाम यह हुआ कि लोगों में जागृति पैदा हुई । सन्त रविदास एक शिक्षित महामानव थे , साहित्य में उनकी चार तरह की वाणियाँ प्राप्त होती है जिसमें भेखरी(भेखली), मदा, वसन्ती और परा । प्रारम्भ की तीन तरह की वाणियों में जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य के कर्मों को दिखाया गया है जिसे ब्राह्मणवादी लोग जोर शोर से प्रचारित करते है किंतु उनकी परा वाणियों को छिपाने का प्रयास किया जाता है । जिसमें वे श्रमण परंपरा के संवाहक के रूप में दिखाई देते है । सन्त रविदास को चारों वेदों का पूरी तरह से अध्ययन था और वे वेदों में वर्णित ब्रह्मा के घिनौने कृत्य को उजागर करते हैं , क्योंकि ब्रह्मा हिंदुओं के ऐसे देवता है जो अपनी पुत्री सरस्वती के साथ ही सम्भोग करते है, लेकिन आज जब इनके वेदों पर चर्चा की जाती है तो ब्राह्मणवादी लोग इस संदर्भ में ब्रह्मा के बचाव पक्ष में खड़ा होकर उनके इस कृत्य को सृष्टि निर्माण का चक्र कहते हैं लेकिन सन्त रविदास ब्राह्मणों को ललकारते है और उनसे स्वयं की पुत्री से सम्भोग करने वाले ब्रह्मा का जिक्र करने वाले वेदों को फूंकने की बात करते है उ की इन वाणियों को आज भी हरियाणा और पंजाब के ग्रामीणांचल क्षेत्रों में रविदासिया समाज के लोगों द्वारा गाया जाता है जिसमें रविदास जी कहते है-
"ब्रह्मा द्वारा रची सृष्टि वा सरस्वती आई
बाप बेटी की हुई बंदगी, फिर सृष्टि अदम रचाई ।
वेद कटेव भागवत गीता यह भी फूंके नाहीं
कह रविदास सुन रे बाभन तेरे वेद ने नारि लुटाई ।।"1

भारतीय समाज में कुलीनतावादी लोग सन्त रविदास को  हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा रक्षक घोषित करते है और उन्हें पूर्व जन्म का ब्राह्मण घोषित करते हैं, तो कुछ लोग उन्हें चंवर वंशज क्षत्रिय घोषित करते है । यह मूल रूप से साजिश करते है, क्योंकि मध्यकालीन भारत मे कबीर एवं रैदास की वैज्ञानिक चेतना का  इतना अधिक प्रभाव था कि परंपरावादी लोग इनसे डरे हुए थे । सन्त रविदास के गूढ़ ज्ञान से पूरा बहुजन समाज जाग्रत हो रहा था, जिससे वे गुलामी की जंजीरों को तोड़कर श्रमण परंपरा को आगे बढ़ा रहे थे, वे माला, हरि, राम जैसे शब्दों से परहेज करने की बात करते है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज बहुजन समाज के ही ऐसे कई सन्त हो गए है जो उनकी मूल विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने की जगह  अंधविश्वास, आडम्बर की ओर लिए जा रहे है । सन्त रविदास के हाथों में हरि लिखकर उनकी मूर्तियाँ बेचते है और उनके नाम की मालाएँ बेचते है । वे बहुजन समाज के  महापुरुषों की वाणियों को अंगीकृत करने की बात करते है । इस संदर्भ में  संत रविदास कहते है-
"माला फेरूं न हरि भजूं मुख से कहूं न राम
मेरा हरि मुझको भजे और मैं करूँ विश्राम ।।"2
  सन्त रविदास के संदर्भ में बहुत से लोग यह प्रचारित-प्रसारित करते है कि वे सगुण और निर्गुण दोनों शाखाओं को मानने वाले थे । इसमें सगुण शब्द का अर्थ गुणों से युक्त होना है तो निर्गुण शब्द का अर्थ गुण विहीन है तब यह समझना जरूरी है कि क्या संत रविदास कबीर गुणविहीन थे ? सामंतवादी हिंदी साहित्य के इतिहासकारों द्वारा ये शब्द जबरन थोपे गए है कबीर एवं रैदास की क्रांतिकारी वाणी को दबाने का प्रयास करने के लिए इन्हें हाशिए पर डाल दिया गया था । निर्गुण शब्द की जगह पर यह मूलतः निर्गुर शब्द था जिसका अभिप्राय है बिना गुरु के । कबीर और रैदास के मूलतः कोई गुरु नही थे, ब्राह्मण को ही श्रेष्ठ घोषित करने के लिए उन्होंने रामानंद को गुरु घोषित कर दिया  जबकि कई जगहों पर कबीर इस बात का खंडन करते हुए कहते हैं -
"याको गुरु तो वा भयो वाको भयो तो वो
पैर पैलका कौन कबीरा वा कौन गुरु ज्ञान दियो ।।"3
गुरु के सम्बंध में मुझे एक चीज बड़ी आश्चर्यजनक लगती है कि रामानंद को कबीर , रैदास का गुरु घोषित किया गया है और इसके बाद 350 वर्ष बाद घासीदास के गुरु रामानन्द होते है जिससे यह स्पष्ट है कि केवल यह हिंदी साहित्य के इतिहासकार दोनों में से एक जगह तो झूठ बोल रहे है ।
जब हम तथागत बुद्ध, रैदास, डॉ अम्बेडकर की विचारधारा को समझने का प्रयास करते है तो यह मालूम होता है कि  ये सभी अपने -अपने समय पर एक ही बात कह रहे हैं । सन्त रविदास किसी ईश्वर की भक्ति की बात नही करते है बल्कि हिन्दू धर्म के देवताओं की विचारधारा को खत्म करके मानवतावादी सोच को विकसित करने की बात करते हैं  वे हिन्दू धर्म के ब्रह्मा, विष्णु , शिव की आडम्बर अंधविश्वास को खत्म करने की बात करते है , आदिशक्ति को पैरों से मसलने की बात करते है जिससे अभिप्राय यह है कि वे आदिशक्ति की कपोलकल्पना को समाप्त करना चाहते है इस देश मे काल(मृत्यु) का भय दिखाकर ही अत्यधिक देवताओं को पूजवाया गया है तब रैदास काल को पकड़कर नचाने की बात करते है जाति वर्ण की तो कल्पना को भी वे समाप्त करने की बात करते हैं उनका प्रभाव इतना अधिक है कि वे कई जगहों पर कहते है कि कोई भी व्यक्ति आडम्बर अंधविश्वास में फंसा हो यदि वह एक बार मेरे पास आ जाये तो उसे ब्राह्मणीकरण के तत्वों से मुक्त करा सकता हूँ  । उनकी यह क्रांतिकारी वाणी वाराणसी के एक सेमिनार में विद्वान वक्ताओं द्वारा सुनने को प्राप्त हुई । जब मैंने इसके संदर्भ पूछा तो उन्होंने बताया कि हरियाणा और पंजाब में आज भी रविदास की यह वाणी लोक गायन में प्रचलित है जिसे मैंने टेब कर लिया, जिसमे वे कहते हैं -
"मैं हूँ अमर कबहुँ न मरता खड़ग विज्ञान चलाऊँ रे
सामर्थ साधु कहलाऊँ ।
ब्रह्मा विष्णु का शीश काटकर शिव को मार भगाऊँ
आदिशक्ति को पैरों से दाबू काल को पकड़ नचाऊँ ।
दस अवतार डरे डर मेरे सूर्य चंद्र राहू
इंदरपुरी के देव सब डरते धरमराज मैं बुलवाऊं ।
चौदह लोक का करूँ निबेड़ा फिर एक ठिकाने लाऊँ
जाति वर्ण की मेट कल्पना सतोसत नाम कहाऊं ।
सुत्ता म्हारे चरणों की दासी मुख की ठौर न ठाउँ
कह रविदास सरन जो आए मैं उसको भी मुक्त कराऊँ ।।"4
इन्ही वाणियों को वर्तमान भारत के संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर अपनाते है । 1956 में जब वे बौद्ध धर्म की धम्म दीक्षा लेते है तब वे 22 प्रतिज्ञाओं  की शपथ भी लेते है जिसमें वे हिन्दू धर्म के ब्रह्मा, विष्णु, महेश एवं अन्य देवी देवताओं न ईश्वर मानते है और न ही पूजा करते है । मध्यकालीन भारत के बहुत से सन्त कवि क्रांतिकारी हुए है, लेकिन उनकी क्रांतिकारी वाणियों को सभी के सापेक्ष नही लाया गया है जिसका मुख्य कारण शिक्षा का अभाव होना था किंतु वर्तमान समय मे बहुजन समाज के हजारों शोधार्थी, साहित्यकार है, तब बहुजन वैचारिकी के सभी महापुरुषों वास्तविक वाणियों को खोजकर सामने लाना होगा । इन सभी वाणियों को पढ़ने के बाद यह तो निश्चित है कि सन्त रविदास हिन्दू धर्म के समर्थक नही थे बल्कि वे उनके मिथकों पर करारा प्रहार करते नजर आ रहे है और वैज्ञानिक चेतना का प्रसार करते नजर आते हैं ।
सन्दर्भ-
1. 30 जनवरी 2018 BHU वाराणसी के पढ़े गए शोध आलेखों की रिकार्डिंग ।
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