हर ओर बदमाश बड़ गये हैं
आदमखोरो के डाह बड़ गये हैं
जहां देखो इन्ही का जमावड़ा है
हर राह में हैवान बड़ गये है
बदसूरत हो गयी है जिन्दगी कुछ इस तरह
हर ओर आतंकवाद बड़ गये है
सहज कोई रह पाता नही आजकल
सरेआम मेहमान लुट रहे हैं
कुछ ख़ामोशी है हर तरफ
जिस वजह से हैवान बड़ रहे हैं
प्रदीप कुमार गौतम
०८/०२/२०१४
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