बहती जिसमें रसधार है
कहती जिसे संसार है
कदम से कदम चलाकर
चलता है वह
दुनिया को अपने राह पर ले
जाने कि चाहे में
करता वह सद्कार्य है
पर नासमझ है वे गौतम
जो करते उससे तकरार है
साहित्य वह है, जो आपको धर्म, जाति, लिंग व क्षेत्रवाद के भाव से ऊपर उठाकर समाज में समता बंधुत्व एकता का भाव प्रकट करे . मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण करके प्रत्येक प्राणी से प्रेम करना सिखाये और दलित संस्कृति इसी भाव को लेकर सदियों से लोक कला एवं साहित्य को संजोकर वर्तमान समय में मानवीय संवेदनाओं की सतत निर्मल धारा को बहा रहा है .
बुद्ध ने कहा— जीवन दुःख है, पर यह अंतिम सत्य नहीं, क्योंकि दुःख-निरोध भी है। तृष्णा से बँधा मन बार-बार जन्म लेता है, और सम्यक दृष्टि उसे मुक...
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