आपमें बस्ती गुलजार ऐसी है
फिजाओं में उड़ती बहार जैसी है
हम तो मर चुके थे तेरी निगाहों में ऐसे
मदमस्त हवाओं में पतवार जैसी है
पर कह न सके थे लफ्ज उनसे कुछ
वे दूर चले गये समुद्र मझधार जैसी है
उनको पाने कि चाहे में दर -दर भटकते है
वे पड़े दूसरे की बाँहों में मधुमास जैसी है
हम चाहते गये वे दूर होते गये
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