1.इन नशीली आँखों ने क्या सितम ढाया है
इन गुलाबी अधरों ने दिल को ज़ोरों से धढकाया है ।
सर्पणी सम है यह कटि तुम्हारी
जिसने इस धरातल को चक्र सम घुमाया है ॥
2.ये मुस्कान दिलेहाल बयां कर रही है
ये केश चन्द्र मुख का श्रंगार कर रहे है ।
थोड़ी-सी हया कर लो ओ दिलवर
यह मादक अवयव जवां होने का अहसास कर रहा है ॥
3.आपके चेहरे की मुस्कान की बात क्या करें ।
उससे नजर हटाने का दिल नहीं करता ॥
4. तुम्हें चाँद का नूर कहूँ
या कोयले से निकला कोहनूर कहूँ ।
ये सम्पूर्ण धारा भी तुम्हारी सजदा कर दे
ऐसी मनोहर अनोखी मूर्ति कहूँ ॥
इन गुलाबी अधरों ने दिल को ज़ोरों से धढकाया है ।
सर्पणी सम है यह कटि तुम्हारी
जिसने इस धरातल को चक्र सम घुमाया है ॥
2.ये मुस्कान दिलेहाल बयां कर रही है
ये केश चन्द्र मुख का श्रंगार कर रहे है ।
थोड़ी-सी हया कर लो ओ दिलवर
यह मादक अवयव जवां होने का अहसास कर रहा है ॥
3.आपके चेहरे की मुस्कान की बात क्या करें ।
उससे नजर हटाने का दिल नहीं करता ॥
4. तुम्हें चाँद का नूर कहूँ
या कोयले से निकला कोहनूर कहूँ ।
ये सम्पूर्ण धारा भी तुम्हारी सजदा कर दे
ऐसी मनोहर अनोखी मूर्ति कहूँ ॥
5.हर दिन सोचता हूँ बात करूँ
तुम्हारे पास आकर तुमसे मुलाकात करूँ ।
दिन बीत गए कुल उन यादों के ।
सोचता हूँ पहले वाले दिनों की शुरुवात करूँ ।।
6.तुम्हारे अधरों की रोमानियत कोई सुरूर तो है ।
दिल के जज्बातो में कोई मगरूर तो है ।
हमसे भी प्यार भरे लफ्ज़ बयाँ कर लिया करो ।
हमसे ही तुम्हारी शान है फिर यह गरूर क्यों है ?
.........प्रदीप कुमार गौतम
No comments:
Post a Comment