Saturday, 3 December 2016

साहित्यकारों की भी जाति होती है

आज का दौर साहित्य के क्षेत्र मे भी जातिगत भेदभाव से अछूता नहीं है । जिधर नजर दौड़ाओ उधर जातिगत अस्मिता के लिए लेखन युद्ध चल है । कोई भी  साहित्यकार आज दलित या आदिवासी लखन पर कलम चलाता है तो उसको दलित या आदिवासी लेखक कहकर साहित्य की परिधि से अलग - थलग करने का दुष्चक्र किया जाता है ।
दलित साहित्य पर कलम चलाने वाले व्यक्ति को सवर्ण मानसिकता के साहित्यकार कुंठित विचारधारा का कवि कहने मे थोड़ा सा भी समय नहीं लगाते है 

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