आज का दौर साहित्य के क्षेत्र मे भी जातिगत भेदभाव से अछूता नहीं है । जिधर नजर दौड़ाओ उधर जातिगत अस्मिता के लिए लेखन युद्ध चल है । कोई भी साहित्यकार आज दलित या आदिवासी लखन पर कलम चलाता है तो उसको दलित या आदिवासी लेखक कहकर साहित्य की परिधि से अलग - थलग करने का दुष्चक्र किया जाता है ।
दलित साहित्य पर कलम चलाने वाले व्यक्ति को सवर्ण मानसिकता के साहित्यकार कुंठित विचारधारा का कवि कहने मे थोड़ा सा भी समय नहीं लगाते है
दलित साहित्य पर कलम चलाने वाले व्यक्ति को सवर्ण मानसिकता के साहित्यकार कुंठित विचारधारा का कवि कहने मे थोड़ा सा भी समय नहीं लगाते है
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