ओस की बूंदों ने बदन भिगो दिया
सरसराती हवाओ ने तन निचोड़ दिया
क्या कह दूँ इस मतवाली धुंध को
सड़कपर चलते हुए की राह को मोड दिया
सोचता हूँ इन बूंदों को हाथों से छू लूँ
शीतलता पाकर बदन को भिगो लूँ
पर क्या छू पाऊँगा इतनी शीतलता को
सरसराती हवाओ ने तन निचोड़ दिया
क्या कह दूँ इस मतवाली धुंध को
सड़कपर चलते हुए की राह को मोड दिया
सोचता हूँ इन बूंदों को हाथों से छू लूँ
शीतलता पाकर बदन को भिगो लूँ
पर क्या छू पाऊँगा इतनी शीतलता को
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