Tuesday, 13 December 2016

उच्च शिक्षा और आरक्षण

भारत देश में जातिगत हीनता बोध से युक्त समाज में नौकरशाही, राजनीति में आरक्षण के माध्यम से मुक्ति करने का एक प्रयास मात्र है । वैसे आरक्षण तो इस देश में सदियों से चला आ रहा है किन्तु उस आरक्षण को समाज व्यवस्था का नाम देकर सामान्य जनता को ठगने का गोरख धंधा चलता रहा है । ब्राह्मण कुल में उत्पन्न पुत्र को जन्म के साथ शादी,हवन,पूजा व श्रेष्ठता का आरक्षण मिल जाता था । क्षत्रिय को जन्म के साथ सेना में भर्ती होने व राजा होने का आरक्षण मिल जाता था । वैश्य को व्यापार करने का आरक्षण मिलता था लेकिन चतुर चालाक लोगो ने इसे आरक्षण न कहकर समाज व्यवस्था कह दिया और देश की कुल जनसंख्या का 85 प्रतिशत हिस्से के ऊपर अन्याय और अत्याचार करके शिक्षा,रक्षा,व्यापार से वंचित रखा गया । लेकिन संविधान की स्थापना के पश्चात् शिक्षा और राजनीति में हिस्सेदारी आरक्षण के रूप में प्राप्त हुई लेकिन जो खुद हजारों वर्षों से अनवरत अभी भी आरक्षण प्राप्त कर रहे हैं वे खुद मजलूमों को प्राप्त आरक्षण का विरोध करते हैं ।  खैर अब मूल विषय पर आते हैं
  
   शिक्षा मनुष्य को मानवीयता से युक्त करने का माध्यम है । उच्च शिक्षा शोध प्रणाली में सक्रियता बरक़रार रखने का सशक्त माध्यम है । आज उच्च शिक्षण संस्थाओं का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि वहाँ पर संविधान में दिए गए आरक्षण का प्रावधान का खुला उल्लंघन किया जा रहा है कई महाविद्यालय तो ऐसे हैं जहाँ पर आरक्षित वर्ग से एक भी प्राध्यापक नही है जो निश्चित रूप से इनकी मानसिकता को उजागर करता है और यदि किसी तरह से कोई प्राध्यापक पहुँच भी जाये तो उसे किसी न किसी माध्यम से कुचक्र करके निकालने का प्रयास किया जाता है ।

    2009 से पहले अनुसूचित जाति छात्र बहुत ही कम पीएचडी कर पाते थे क्योंकि उन्हें कोई करवाता ही नही था लेकिन 2014 से राज्यविश्वविद्यालयोन में पीएचडी होने लगी है लेकिन वहाँ पर भी जातिगत भेदभाव को अपनाते हुए आरक्षित सीटों में पूरी सीटें नही भरी जाती है  । उच्च शिक्षा में जितना अधिक भेदभाव व्याप्त है उतना अन्यत्र कहीं नही मिलेगा ।

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