राजनीति शब्द किसी वक्त बेहद रोचक एवम् पवित्रता से युक्त था । चाणक्य ने तो पूरा का पूरा ग्रन्थ लिख डाला था । आधुनिक भारत में देश को आजाद कराने में अहम् भूमिका रखने वाले सुभाषचंद्र बोस को ससम्मान पूरा भारतवर्ष नेता जी कहता है क्योंकि उनकी राजनीति में भी देश को आजाद कराने का पवित्र भाव छिपा हुआ था । देश में संविधान के निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर जी दो कदम आगे निकालकर समाज के उत्थान एवम् मानवतावादी समाज की स्थापना हेतु राजनीति में आते हैं । जब वे भारत सरकार के प्रथम कानून मंत्री बनते हैं तो स्त्रियों को पुरुषों के समान हक़ व सम्मान दिलाने हेतु हिंदुकोड बिल संसद में प्रस्तुत करते हैं लेकिन भेदभाव से युक्त नेहरू सरकार का जब उन्हें समर्थन प्राप्त नही होता है तो वे पद कानून मंत्री पद से त्यागपत्र दे देते हैं क्योंकि उनकी राजनीति स्वम् का नाम फ्रेम की जगह समाजोत्थान के लिए थी ।
वर्तमान भारतीय राजनीति की बात करने पर लोग अपने बच्चों को दूर रहने की सलाह देते है और जो लोग राजनीति करते भी हैं तो वे पूरी तरह से दलाली के कार्यों में संलग्न हो गए है आज एक छुटभैया नेता एक दो साल में लखपति से करोड़पति हो जाता है । आज देश में जितनी भी पार्टियाँ है उन सभी में सामाजिक लोगो से अधिक अपराधी और व्यवसायी लोगों कि तादात है । अपराधी प्रवृत्ति के लोग राजनीति में आकर अपने को पवित्र करते है और व्यवसायी लोग राजनीति में आकर व्यवसाय का प्रचार प्रसार करते हैं । जितने भी राजनीतिक दल हैं उन सभी की विचारधारा पूर्णतः महापुरुषों के चित्र में माला चढ़ाने तक सीमित रह गई है । इसलिए आज लोगों को राजनीति से घिन आने लगी है ।
साहित्य वह है, जो आपको धर्म, जाति, लिंग व क्षेत्रवाद के भाव से ऊपर उठाकर समाज में समता बंधुत्व एकता का भाव प्रकट करे . मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण करके प्रत्येक प्राणी से प्रेम करना सिखाये और दलित संस्कृति इसी भाव को लेकर सदियों से लोक कला एवं साहित्य को संजोकर वर्तमान समय में मानवीय संवेदनाओं की सतत निर्मल धारा को बहा रहा है .
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Friday, 9 December 2016
राजनीति से घिन आने लगी है ।
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