Thursday, 1 December 2016

ओस की बूंद कहूँ

1. कोई करता है सजदा वीरों से 
   कोई करता है सजदा फकीरों से । 
   हम तो श्रंगार के पुजारी हैं  
   ये सिर झुकता है नाजुक से फूलों मे ॥ 


2. तुम्हें आसमान का चाँद कहूँ 
   या बादलों से टपकती हुई ऑस की बूँद कहूँ । 
   तू है ऐसी की नूर-ए-हुस्न का इक़बाल नहीं लफ़्जों में 
   शीतल हवाओं के झोकें से हिलती हुई कदंब की पाती कहूँ ॥ 

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